पति के लिए तीज, बेटे के लिए जीतिया करती हैं पत्नी, उनका भी दायित्व था इसलिए बेटी के लिए खुद शुरू किया छठ

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अशोक प्रियदर्शी

28 साल पहले की बात है। दरभंगा के डाॅ संजय पासवान की पत्नी डाॅ प्रमांशी जयदेव गर्भवती थीं। तभी बेटी की कामना के लिए डाॅ पासवान ने छठ की शुरूआत की थी। बेटी पैदा होने के बाद से वह लगातार छठ व्रत करते आ रहे हैं। लिहाजा, बेटी का नाम भी अदिती रखा है। डाॅ पासवान के मुताबिक, उन्हें पुत्र गुरूप्रकाश था। लेकिन वह बेटी भी चाहते थे। इसलिए सूर्य से प्रार्थना का पर्व शुरू किया। डाॅ पासवान कहते हैं कि सूर्योपासना अकेला पर्व जिसमें प्रकृति से सीधे साक्षात होता है।        

देखें तो, पटना यूनिवर्सिटी के प्रो डाॅ पासवान के पिता महावीर पासवान चीफ इंजीनियर से रिटायर्ड हुए। उनकी मां कृष्णा देवी गृहिणी। पत्नी डाॅ प्रमांशी जयदेव भी प्रोफेसर हैं। लेकिन पासवान के परिवार में पहला अवसर था जब उन्होंने छठ व्रत शुरू किया। खास कि ज्यादातर महिलाएं इस पर्व को करतीं हैं। लेकिन डाॅ पासवान ने खुद शुरू किया। वह कहते हैं कि पति की दीर्घायू के लिए पत्नी तीज और करवा चैथ  जैसी पर्व करती हंै। बेटे की दीर्घायू के लिए जीतिया। ऐसे में उनका भी दायित्व बनता है। लिहाजा, बेटी के लिए छठ पर्व शुरू किया।        यही नहीं, वह छठ पर्व परंपरागत तरीके से करते रहे हैं। दस साल पहले तक पटना के गंगा घाट पर जाया करते थे। लेकिन विधि व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो जाती थी। इसलिए घर में शुरू किया। बहुत व्यस्त रहने के बाद भी इस पर्व के क्रम को नही छोड़ा।       

डाॅ पासवान मानते हैं कि छठ प्रकृति का पर्व है। इसमें सकरकंड, सुथनी, ईख, आटा जैसे वस्तुओं से अराधना की जाती है। इसमें खुद पूजा करने की परंपरा रही है। यह पर्व प्रकृतिक वस्तुओं के सम्मान का पर्व है। प्रकृति और आकृति के संयोग से यह संस्कृति विकसित हुआ है। यह वैज्ञानिक दृष्टि से भी सही है।       

 विचारनीय बात यह कि छठ के समय अपराध की घटनाएं कम जाती है। डाॅ पासवान कहते हैं कि पूरे साल में दीपावली का अमावशया सबसे काला होता है। दीपावली के इस अंधकार से दीप से लड़ते हैं। लोग सूर्य की अराधना करते हैं। यह पर्व तब पूरी होती है जब सातवां दिन यानि जिस दिन पारण होता है उस दिन सुबह की किरणें पूरी तरह लाल होकर सामने आती है। यानि पूरी लालिमा में होती है। इसके पहले नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला, बैगनी सूर्य की रंगें होती है। यह सात दिनों की अराधना का प्रतिफल है। सात रंगों विबजियोर यानि बैनिआहपिनाला की प्रक्रिया से होकर लाल रंग के बाद पूरी उजियारा आता है।         

डाॅ पासवान कहते हैं यह प्रकृति पर्व समन्वय का पर्व है। इसके खान पान के पीछे भी प्रकृति से जुड़ी कहानी है। नहाय खाय के दिन लोग कदु भात खाते हैं। कदु हल्का लेकिन अच्छा तासिर होता है। भात इसलिए खाया जाता है कि सृष्टि की शुरूआत चावल से होती है। अच्छत जिसका कभी क्षति नही होता। डाॅ पासवान के मुताबिक, सूर्य पर्व का नवरात्र से भी गहरा संबंधा है। साधारण लोग छह दिनों तक पूजा के बाद छोड़ देते हैं। लेकिन संपन्न लोग नवरात्रि तक करते हैं।

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