नवादा टुडे डेस्क
काशीचक प्रखंड क्षेत्र के धानपुर और पाली गांव के गड़ेरिया जाति के लोग अपने पारंपरिक रोजगार से विमुख होते जा रहे हैं। जिस कारण एक ओर स्थानीय ग्रामीणों को सस्ते में उपलब्ध होने वाले विशुद्ध कम्बल से वंचित होना पड़ रहा है। दूसरी ओर गड़ेरिया परिवार के सदस्यों को रोजी रोटी की तलाश में भटकना पड़ रहा है। सरकारी उदासीनता के कारण आदिकाल से चला आ रहा कम्बल बनाने का धंधा दम तोड़ रहा है।
ग्रामीण बताते हैं कि पहले यहां के गड़ेरियों द्वारा हस्त निर्मित कम्बल की दूर-दूर तक मांग थी। कम कीमत और विशुद्ध ऊन से बना होने के कारण नाते-रिश्तेदार और जान पहचान वाले लोग अपने परिचितों से कम्बल खरीदवाकर मंगवाते थे। जाड़े के महीनों में पूजा की आसनी ,मफलर , कम्बल खरीदने वालों की तादाद बढ़ जाती थी। मगर हालिया दिनों में तेजी से हावी होते बाजारवाद ने इस पुश्तैनी धंधे की कमर तोड़ दी है। पूंजी की कमी,बिक्री व्यवस्था का आभाव और मेहनत की पूरी कीमत नहीं मिलने से परेशान गड़ेरियों ने भेड़ पालन से किनारा करना शुरू कर दिया है।
भेड़ पालन में लगे बिरजू भगत ने बताया भेड़ से तैयार ऊन की बिक्री के लिए सरकारी स्तर पर कोई व्यवस्था नहीं है। खादी ग्रामोद्योग बोर्ड द्वारा ऊन क्रय करने की व्यवस्था बहुत जरुरी है। उचित बाजार नहीं मिलने के कारण ऊन से कम्बल बनाकर औने पौने दाम में बेचना पड़ता है। जिससे वास्तविक मजदूरी भी नहीं मिल पाता।
सिक्कू पाल ने बताया कि कम्बल निर्माण मंदा पड़ने का मुख्य कारण बुनकरों को नई तकनीक के प्रशिक्षण का अभाव है। वर्ष 1996 में तत्कालीन विधायक रामाश्रय प्रसाद सिंह के प्रयास से ट्रायसेम योजनांतर्गत धानपुर गांव में बुनकर प्रशिक्षण सह उत्पादन केंद्र भवन का निर्माण कराया गया था। मगर विभागीय उदासीनता के कारण प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं की गई। लिहाजा लाखों रूपए की लागत से बना प्रशिक्षण भवन भेड़ों का तबेला बनकर रह गया है।
भेड़ पालक रामू भगत ने बताया हमलोगों द्वारा बनाया कम्बल काफी गर्म और उम्दा होता है। मगर खरीददार ब्रांडेड कम्बल की तरह फिनिशिंग नहीं होने के कारण मामूली कीमत देते हैं। जिस कारण भेड़पालन के धंधे से जीवन यापन हो पाना बहुत मुश्किल है। चंद परिवारों को छोड़कर अधिकांश गड़ेरिया जाति के परिवार खेती, नौकरी और दुकानदारी का रुख कर चुके हैं। सरकारी उदासीनता के कारण कोई युवक इस पारंपरिक रोजगार को अपनाना नहीं चाहता है। ऐसा तब है जब सरकार जमीन से जुड़ने और पारंपरिक रोजगार को बढ़ावा देने के रोज दावे करती है। जबकि वास्तविकता इससे इतर है। आज दम तोड़ते कम्बल निर्माण और भेड़ पालन की सुध लेने वाला कोई नहीं है।
बीडीओ भरत कुमार सिंह ने बताया कि भेड़ पालकों द्वारा इस बावत आवाज उठाने की आवश्यकता है। इनकी समस्या से उच्चाधिकारियों को अवगत कराया जाएगा।






















































































































